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नील सरस्वती स्तोत्र (Neel Saraswati Stotram)



घोर रूपे महारावे सर्वशत्रु भयंकरि।
भक्तेभ्यो वरदे देवि त्राहि मां शरणा गतम्।।१।।

ॐ सुरासुरार्चिते देवि सिद्धगन्धर्वसेविते।
जाड्यपापहरे देवि त्राहि मां शरणा गतम्।।२।।

जटाजूटसमायुक्ते लोलजिह्वान्तकारिणि।
द्रुतबुद्धिकरे देवि त्राहि मां शरणा गतम्।।३।।

सौम्यक्रोधधरे रूपे चण्डरूपे नमोSस्तु ते।
सृष्टिरूपे नमस्तुभ्यं त्राहि मां शरणा गतम्।।४।।

जडानां जडतां हन्ति भक्तानां भक्तवत्सला।
मूढ़तां हर मे देवि त्राहि मां शरणा गतम्।।५।।

वं ह्रूं ह्रूं कामये देवि बलिहोमप्रिये नम:।
उग्रतारे नमो नित्यं त्राहि मां शरणागतम्।।६।।

बुद्धिं देहि यशो देहि कवित्वं देहि देहि मे।
मूढत्वं च हरेद्देवि त्राहि मां शरणा गतम्।।७।।

इन्द्रा दिविलसद द्वन्द्ववन्दिते करुणा मयि।
तारे ताराधिनाथास्ये त्राहि मां शरणा गतम्।।८।।

अष्टभ्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां य: पठेन्नर:।
षण्मासै: सिद्धिमा प्नोति नात्र कार्या विचारणा।।९।।

मोक्षार्थी लभते मोक्षं धनार्थी लभते धनम्।
विद्यार्थी लभते विद्यां विद्यां तर्क व्याकरणा दिकम।।१०।।

इदं स्तोत्रं पठेद्यस्तु सततं श्रद्धयाSन्वित:।
तस्य शत्रु: क्षयं याति महा प्रज्ञा प्रजा यते।।११।।

पीडायां वापि संग्रामे जाड्ये दाने तथा भये।
य इदं पठति स्तोत्रं शुभं तस्य न संशय:।।१२।।

इति प्रणम्य स्तुत्वा च योनि मुद्रां प्रदर्श येत।।१३।।

।।इति नीलसरस्वतीस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।

नील सरस्वती स्तोत्र का हिंदी अर्थ 
(Neel Saraswati Stotram)

हे देवी, अपनी विकराल और भयानक अभिव्यक्ति में, सभी विरोधियों में भय पैदा करते हुए,

अपने भक्तों पर अपना आशीर्वाद बरसाएं और अपनी शरण में मेरी रक्षा करें।

हे देवी, देवताओं और राक्षसों द्वारा समान रूप से पूजनीय, सिद्धों और गंधर्वों द्वारा सम्मानित,

हे देवी, जड़ता और पापों को दूर करने वाली, मेरी रक्षा करो, जो तुम में शरण चाहता है।

हे उलझे हुए बालों और उभरी हुई जीभ से सुशोभित, बुद्धि को जीवंत करने वाली देवी,

आपकी शरण में आने वाले मेरी रक्षा करें।

हे देवी, सौम्य और क्रोध दोनों रूपों से युक्त, मैं विनम्रतापूर्वक सृजन की प्रतीक आपको नमन करता हूं।

आपकी शरण में आने वाले मेरी रक्षा करें।

आप अज्ञानियों की अज्ञानता को दूर करते हैं और अपने भक्तों के प्रति स्नेह रखते हैं।

हे देवी, मेरी अज्ञानता दूर करो और मेरी रक्षा करो, जो तुममें शरण चाहता है।

हे देवी, मैं लालसा से ‘वं ह्रूं ह्रूं’ अक्षरों का आह्वान करता हूं। मैं यज्ञ से प्रसन्न होकर उग्र रूप में आपको प्रणाम करता हूँ।

मेरी रक्षा करो, जो तेरी शरण में आता हूँ।

हे देवी, मुझे बुद्धि प्रदान करो, मुझे यश प्रदान करो, मुझे काव्यात्मक वाक्पटुता प्रदान करो।

हे देवी, मेरी अज्ञानता दूर करो और तुम्हारी शरण में आने वाले मेरी रक्षा करो।

हे देवी, इंद्र और अन्य लोगों द्वारा पूजित, दयालु, आप शरण चाहने वालों की संरक्षक हैं।

मेरी रक्षा करो, जो तेरी शरण में आता हूँ।

जो कोई आठवें, चौदहवें या नौवें दिन इस स्तोत्र का पाठ करेगा,

उसे छह महीने के भीतर निःसंदेह सफलता प्राप्त होगी।

मुक्ति चाहने वाले को मुक्ति मिलती है, धन चाहने वाले को धन प्राप्त होता है,

ज्ञान चाहने वाले को तर्क और व्याकरण सहित गहन समझ प्राप्त होती है।

जो लोग श्रद्धापूर्वक नियमित रूप से इस भजन का पाठ करते हैं,

वे अपने शत्रुओं के विनाश और अपने भीतर महान ज्ञान के उदय का गवाह बनेंगे।

क्लेश, कलह, जड़ता, परोपकार या भय के समय, निस्संदेह,

जो लोग इस भजन को पढ़ते हैं उन्हें शुभता प्राप्त होती है।

इस प्रकार नमस्कार और स्तुति करने के बाद,

व्यक्ति को योनि मुद्रा प्रदर्शित करनी चाहिए, जो महिला प्रजनन अंग का प्रतीक है।

Neel Saraswati Stotram in English Lyrics

Ghorarupe maharave sarvasatrubhayankari
Bhaktebhyo varade devi trahi mam saranagatam

Om surasurarcite devi siddhagandharvasevite
Jadyapapahare devi trahi mam saranagatam

Jaṭajuṭasamayukte lolajihvantakarini
Drutabuddhikare devi trahi mam saranagatam

Saumyakrodhadhare rupe chandarupe namostute
Sṛṣṭirupe namastubhyam trahi mam saranagatam

Jadanam jadatam hanti bhaktanam bhaktavatsala
Mudhatam hara me devi trahi mam saranagatam

Vam hrum hrum kamaye devi balihomapriye namaḥ
Ugratare namo nityam trahi mam saranagatam

Buddhim dehi yaso dehi kavitvam dehi dehi me
Mudhatvam cha hareddevi trahi mam saranagatam

Indradivilasad-dvandvavandite karunamayi
Tare taradhinathasye trahi mam saranagatam

Aṣṭamyam cha caturdasyam navamyam yaḥ paṭhennaraḥ
Sanmasaih siddhimapnoti natra karya vicarana

Mokṣarthi labhate mokṣam dhanarthi labhate dhanam
Vidyarthi labhate vidyam tarkavyakaranadikam

Idam stotram paṭhedyastu satatam sraddhayanvitaḥ
Tasya satruḥ kṣayam yati mahaprajna prajayate

Pidayam vapi samgrame jadye dane tatha bhaye
Ya idam pathati stotram subham tasya na samsayaḥ

Iti pranamya stutva cha yonimudram pradarsayet

नील सरस्वती स्तोत्र को पढ़ने की विधि 
(Neel Saraswati Stotram)

प्रारंभ में, शुभ मुहूर्त चुनें और माता को ध्यान लगावें, शत्रु पर विजय पाने के लिए इस स्तोत्र का पाठ अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी को अवश्य करना चाहिए।
पूजा स्थल को शुद्ध करें और मां सरस्वती की मूर्ति, या उनकी चित्र पर अपने ध्यान को केंद्रित करें।
मां सरस्वती की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठें या खड़े रहे।
प्रारंभ करने से पहले, माता के ध्यान में चलें जाये और मां सरस्वती के चरणों में आवाहन करें।

फिर नील सरस्वती स्तोत्र (Neel Saraswati Stotram) का पाठ करें, विशेष ध्यान देते हुए मां सरस्वती की महिमा को स्तुति करें।
अंत में, मां सरस्वती को अर्पण करें और उनसे आशीर्वाद मांगें।
स्तोत्र का पाठ करते समय, शुद्धता, श्रद्धा, और समर्पण के साथ पूर्ण करें।

ध्यान रखें कि नील सरस्वती स्तोत्र (Neel Saraswati Stotram) का पाठ शुभ मुहूर्त (अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी) में और नियमित रूप से किया जाना चाहिए ताकि मां सरस्वती की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त हो सकें।

Neel Saraswati Stotram Video



मंत्र पुष्पांजलि (Mantra Pushpanjali)

मंत्र पुष्पांजलि के समय फूल अर्पित करते भक्तों की छवि

मंत्र पुष्पांजलि (Mantra Pushpanjali)

प्रथम:

ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तनि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
ते ह नाकं महिमान: सचंत यत्र पूर्वे साध्या: संति देवा: ॥

द्वितीय:

ॐ राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने।
नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे।
स मस कामान् काम कामाय मह्यं।
कामेश्र्वरो वैश्रवणो ददातु कुबेराय वैश्रवणाय।
महाराजाय नम:।

तृतीय:

ॐ स्वस्ति, साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं
वैराज्यं पारमेष्ट्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं।
समन्तपर्यायीस्यात् सार्वभौमः सार्वायुषः आन्तादापरार्धात्।
पृथीव्यै समुद्रपर्यंताया एकरा‌ळ इति ॥

चतुर्थ:

ॐ तदप्येषः श्लोकोभिगीतो।
मरुतः परिवेष्टारो मरुतस्यावसन् गृहे।
आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभासद इति॥
॥ मंत्रपुष्पांजली समर्पयामि ॥

मंत्र पुष्पांजलि का अर्थ (Meaning of Mantra Pushpanjali)

पहला: यज्ञ के माध्यम से ही देवताओं ने प्रजापति की पूजा की। वे यज्ञ और तत्सम पूजा के प्रारंभिक अनुष्ठान कर्ता थे। यज्ञ करने से साधक उस दिव्य लोक में पहुँचकर महानता प्राप्त करता है जहाँ पहले देवता निवास करते थे।

दूसरा: हम राजा वैश्रवण कुबेर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जो हमारे लिए अनुकूल परिस्थितियाँ सुनिश्चित करते हैं। कामना करने वाले की सभी मनोकामनाएं कामनेश्वर कुबेर पूर्ण करें।

तीसरा: हमारा लक्ष्य सबके लिए कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। हमारा राज्य सभी वस्तुओं से प्रचुर मात्रा में सुसज्जित हो। यहां लोकराज्य हो। हमारा राज्य मोह और लोभ से रहित होना चाहिए। हम एक सर्वोच्च शासक के रूप में उत्कृष्टता प्राप्त करें। हमारा राज्य क्षितिज के पार सुरक्षित रहे और ज़मीन से लेकर समुद्र तक एक स्थायी शासन का आनंद उठाए। हमारा राज्य अंत तक कायम रहे।

चौथा: यह श्लोक राज्य और उसकी महिमा के सम्मान में गाया जाता है। हमें अविक्षित के पुत्र मरुती के सहयोग से राज्य प्राप्त हो। यही कामना है।

मंत्र पुष्पांजलि की विधि (Mantra Pushpanjali Vidhi)

  • तैयारी: इस मंत्र का पाठ करने से पहले, शुद्धि और संकल्प करें। ध्यान और मन को एकाग्र रखें।
  • पूजा स्थल: एक शुद्ध और साफ पूजा स्थल चुनें। यह स्थल आरामदायक होना चाहिए और पूजा के लिए उपयुक्त होना चाहिए।
  • आसन: पूजा के लिए विशेष आसन पर बैठें। सही आसन में बैठकर ध्यान में रहें।
  • मंत्र पुष्पांजलि का पाठ: मंत्र पुष्पांजलि को धीमी आवाज में ध्यानपूर्वक पढ़ें। इसे ध्यान से सुनते हुए उच्चारण करें।
  • पुष्पांजलि अर्पण: मंत्र पाठ करते समय, फूलों की माला या अन्य फूलों को अपने हाथों में लें। मंत्र पूरा होने पर फूलों को ईश्वर को अर्पित करें।
  • ध्यान और प्रार्थना: मंत्र पुष्पांजलि के पाठ के बाद, ध्यान करें और ईश्वर से आशीर्वाद और शांति की प्रार्थना करें।
  • समापन: सम्पूर्ण प्रक्रिया के बाद, ध्यान और आनंद से शांति का अनुभव करें।

मंत्र पुष्पांजलि के फायदे (Benefit of Mantra Pushpanjali)

  • आत्मशुद्धि: इस मंत्र का जाप करने से आत्मा में शुद्धि और ऊर्जा का संचार होता है।
  • ध्यान और शांति: इस मंत्र के जाप से चित्त शांति और ध्यान में स्थिरता मिलती है।
  • सामाजिक सहयोग: यह मंत्र समाज में सहयोग, समृद्धि और सामंजस्य की भावना विकसित करता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: इसके जाप से आध्यात्मिक उन्नति होती है और आध्यात्मिक उद्देश्यों की प्राप्ति में मार्गदर्शन होता है।
  • व्यक्तिगत उन्नति: इस मंत्र का जाप करने से व्यक्ति की मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक स्थिति में सुधार हो सकता है।
  • कृपा और आशीर्वाद: यह मंत्र ईश्वर की कृपा, शक्ति, और आशीर्वाद प्राप्त करने में मदद करता है।
  • सुख-शांति की प्राप्ति: इस मंत्र के जाप से समय की ऊर्जा, शांति, और सफलता प्राप्त होती है।

क्षमा याचना मंत्र (Kshama Yachna Mantra)



क्षमा याचना मंत्र (Kshama Yachna Mantra)

“आवाहनं न जानामि न जानामि तवार्चनम्। पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरी।”

“मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि। यत्पूजितं मया देव। परिपूर्ण तदस्तु मे॥

क्षमा याचना मंत्र अर्थ (Kshama Yachna Mantra )

हे प्रभु मै आपको बुलाना जनता हूँ।और न ही विदा करना। और न ही मै पूजा करना जनता हूँ। कृपया करके मुझे क्षमा करे। न ही मुझे मंत्र याद है और न ही क्रिया न ही भक्ति करना जनता हूँ। यथासंभव पूजा कर रहा हूँ। आप मेरे भूलो को क्षमा कर इस पूजा को पूर्णता प्रदान करे।

अन्य क्षमा याचना मंत्र (Other Kshama Yachna Mantra)

शनि क्षमा याचना मंत्र

अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेहर्निशं मया।

दासोयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर।।

गतं पापं गतं दु:खं गतं दारिद्रय मेव च।

आगता: सुख-संपत्ति पुण्योहं तव दर्शनात्।।

शिव क्षमा याचना मंत्र

मृत्युञ्जय महारुद्र त्राहि मां शरणागतम्
जन्म मृत्युजरारोगैः पीड़ितं कर्म बन्धनैः ।।१।।

मन्त्रेणाक्षर हीनेन पुष्पेण विफलेन च
पूजितोसि महादेव तत्सर्वं क्षम्यतां मम ।।२।।

करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवननयंजं वा मानसं वापराधम् ।।३।।

विहितमविहितं वा सर्वमेततक्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्री महादेवशम्भो ।।४।।

।। ॐ मृत्युञ्जयाय तत्सत् नमम ॐ ।।

दुर्गा क्षमा याचना मंत्र

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथा: ।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥ 1 ॥

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत् ।
तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ 2 ॥

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहव: सन्ति सरला:
परं तेषां मध्ये विरलतरलोSहं तव सुत: ।
मदीयोSयं त्याग: समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ 3 ॥

जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥ 4 ॥

परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि ।
इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥ 5 ॥

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकै: ।
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जन: को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥ 6 ॥

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति: ।
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥ 7 ॥

न मोक्षस्याकाड़्क्षा भवविभववाण्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुन: ।
अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपत: ॥ 8 ॥

नाराधितासि विधिना विविधोपचारै:
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभि: ।
श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥ 9 ॥

आपत्सु मग्न: स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि ।
नैतच्छठत्वं मम भावयेथा:
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥ 10 ॥

जगदम्ब विचित्रमत्र किं
परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि ।
अपराधपरम्परावृतं
न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥ 11 ॥

मत्सम: पातकी नास्ति
पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवं ज्ञात्वा महादेवि
यथा योग्यं तथा कुरु ॥ 12 ॥

इति श्रीमच्छंकराचार्यकृतं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्।
पृथ्वी क्षमा याचना मंत्र

ॐ समुद्र वसने देवी पर्वतस्तन मंडिते |

विष्णुपत्नीं नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व में ||

क्षमा याचना मंत्र के लाभ (Kshama Yachna Mantra Benefit)

आत्म-स्वीकृति और आत्म-सम्मान में वृद्धि:
क्षमा याचना मंत्र हमें यह स्वीकार करने में मदद करता है कि हम सभी मनुष्य हैं और हम सभी गलतियाँ करते हैं। यह हमें अपने आप को और दूसरों को माफ करने में मदद करता है, जिससे आत्म-स्वीकृति और आत्म-सम्मान में वृद्धि होती है।

मानसिक शांति और स्पष्टता:
क्षमा याचना मंत्र हमें अपनी गलतियों से मुक्त होने में मदद करता है। यह हमें मानसिक शांति और स्पष्टता प्राप्त करने में मदद करता है, जिससे हमें बेहतर निर्णय लेने और अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव करने में मदद मिलती है।

रिश्तों में सुधार:
क्षमा याचना मंत्र हमें दूसरों से क्षमा मांगने और उन्हें माफ करने में मदद करता है। यह रिश्ते में विश्वास, सम्मान और सद्भाव को बढ़ावा देता है।

आध्यात्मिक विकास:
क्षमा एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक गुण है। क्षमायाचना मंत्र हमें दूसरों और स्वयं के साथ अधिक दयालु और क्षमा करने वाले होने में मदद करता है। यह आध्यात्मिक विकास की ओर ले जाता है।

क्षमा याचना मंत्र विधि (Kshama Yachna Mantra Vidhi)एकांत में बैठें।

अपनी आंखें बंद करें और अपनी सांस पर ध्यान केंद्रित करें।
मंत्र का जाप करना शुरू करें।
मंत्र के अर्थ पर ध्यान केंद्रित करें।
अपनी गलतियों के लिए ईमानदारी से माफी मांगें।
मंत्र का जाप तब तक करें जब तक आप शांति और स्पष्टता का अनुभव न करें।

क्षमायाचना मंत्र का जाप करने के लिए कोई विशेष समय या स्थान आवश्यक नहीं है। आप इसे सुबह, शाम या किसी भी समय जब आपके पास कुछ शांत क्षण हों, कह सकते हैं।

Kshama Yachna Mantra Video



सिद्ध कुंजिका स्तोत्र (Sidhha Kunjika Stotra)



शिव उवाच:
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत ॥1॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम् ।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ॥2॥

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत् ।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ॥3॥

गोपनीयं प्रयत्‍‌नेनस्वयोनिरिव पार्वति ।
मारणं मोहनं वश्यंस्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत्कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम् ॥4॥

॥ अथ मन्त्रः ॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लींचामुण्डायै विच्चे ॥
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालयज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वलहं सं लं क्षं फट् स्वाहा ॥

॥ इति मन्त्रः ॥
नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि ।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥1॥

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि ।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे ॥2॥

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥3॥

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ॥4॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्‍‌नी वां वीं वूं वागधीश्‍वरी ।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥5॥

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी ।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥6॥

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं ।
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥7॥

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे ॥8॥

इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रंमन्त्रजागर्तिहेतवे ।
अभक्ते नैव दातव्यंगोपितं रक्ष पार्वति ॥
यस्तु कुञ्जिकाया देविहीनां सप्तशतीं पठेत् ।
न तस्य जायतेसिद्धिररण्ये रोदनं यथा ॥

॥ इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

Sidhha Kunjika Stotra In English Lyfics

Shiva Uvach:
Shrunu Devi Pravakshyami, Kunjikastotramuttamam ।
Yen Mantra Prabandh Chandijap: Shubho Bhavet ॥ 1 ॥

Na Kavachan Nargalastotran Kilakam N Rahshyakam ।
Na Sooktan Napi Dhyanan Ch Na Nyaso Na Ch Varchanam ॥ 2 ॥

Kunjikapathamatren Durgapathaphalam Labhet ।
Ati Guhayataran Devi Devanampi Rarekam ॥ 3 ॥

Gopaniyan Prayat‍‌nenasvayoniriv Parvati ।
Maranam Mohanam Vyasastambhochnathatadikam ।
Pathmatren Sanskidhyetkunjikastotramuttamam ॥ 4 ॥

॥ Ath Mantrah ॥
Om Ain Hrin Klinchamundayai Vichche ॥
Om Glaun Hun Klin Joon Sah Jvalayajvalay Jval Jval Prajval Prajval
Ain Hrin Klin Chamundayai Vichche Jvalahan San Lan Kshan Phat Svaha ॥

॥ Iti Mantrah ॥
Namaste Roodraroopinyai Namaste Madhumardini ।
Namah Kaitabhaharinyai Namaste Mahishardini ॥ 1 ॥

Namaste Shumbhahantryai Ch Nishumbhasuraghatini ।
Jagratan Hi Mahadevi Japan Siddhan Kurooshv Me ॥ 2 ॥

Ainkari Srshtiroopayai Hrinkari Pratipalika ।
Klinkari Kamaroopinyai Bijaroope Namostu Te ॥ 3 ॥

Chamunda Chandaghati Ch Yaikari Varadayini ।
Vichche Chabhayada Nityan Namaste Mantraroopini ॥ 4 ॥

Dhan Dhin Dhoon Dhoorjateh Pat‍‌ni Van Vin Voon Vagadhish‍vari ।
Kran Krin Kroon Kalika Devi Shan Shin Shoon Me Shubhan Kuru ॥ 5 ॥

Hun Hun Hunkararoopinyai Jan Jan Jan Jambhanadini ।
Bhran Bhrin Bhroon Bhairavi Bhadre Bhavanyai Te Namo Namah ॥ 6 ॥

An Kan Chan Tan Tan Pan Yan Shan Vin Dun Ain Vin Han Kshan ।
Dhijagran Dhijagran Trotay Trotay Diptan Kuru Kuru Svaha ॥ 7 ॥

Pan Pin Poon Parvati Poorna Khan Khin Khoon Khechari Tatha ।
San Sin Soon Saptashati Devya Mantrasiddhin Kurushv Me ॥ 8 ॥

Idan Tu Kunjikastotramantrajagartihatave ।
Abhakte Naiv Datavyangopitan Raksh Parvati ॥
Yastu Kunjikaya Devihinam Saptashati Pathet ।
Na Tasy Jayatesiddhiraranye Rodanan Yatha ॥

Iti Srirudrayamale Gauritantre Shivaparvatisamvade Kunjikastotram Sampoornam ॥

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र लाभ (Sidhha Kunjika Stotra Benefit)

शांति और समृद्धि: माना जाता है कि यह स्तोत्र आपके जीवन में शांति और समृद्धि लाता है। यह आपको धन, संपत्ति, अच्छे स्वास्थ्य और पारिवारिक सुख-समृद्धि प्रदान कर सकता है।

सफलता: यह स्तोत्र आपको अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद कर सकता है। यह आपको अपने करियर में सफलता, व्यापार में लाभ और शिक्षा में प्रगति प्रदान कर सकता है।

सुरक्षा: यह स्तोत्र आपको सभी प्रकार की बुराई से बचा सकता है। यह आपको शत्रुओं, दुर्घटनाओं और रोगों से बचा सकता है।

भय और नकारात्मकता को दूर करना: यह स्तोत्र आपके जीवन से भय और नकारात्मकता को दूर करने में मदद कर सकता है। यह आपको आत्मविश्वास और सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान कर सकता है।

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र विधि (Sidhha Kunjika Stotra Vidhi)

स्तोत्र का जप करने से पहले स्नान करें और साफ कपड़े पहनें।
एक शांत और पवित्र स्थान पर बैठें।

माता दुर्गा की मूर्ति, या उनका चित्र, या किसी स्थान पर ध्यान दें जहां आप बैठकर पूजा करना चाहेंगे।

स्तोत्र का जप ध्यानपूर्वक और स्पष्ट उच्चारण के साथ करें।
स्तोत्र का जप करने के बाद, देवी दुर्गा को नमस्कार करें।

स्तोत्र का जप एक माला (108 मोती) का उपयोग करके किया जा सकता है।
स्तोत्र का जप कम से कम 108 बार करें।

पूजा को समाप्त करने के बाद, प्रासाद बांटें और आपकी पूर्णता और कष्टों की निवृत्ति के लिए माता से आशीर्वाद प्राप्त करें।


Sidhha Kunjika Stotra Video



संगठन मंत्र (Sangathan Mantra)



प्रथम श्लोक

ॐ संगच्छध्वम् सं वद्धवम् सं वो मनाँसि जानताम् ।
देवा भागम् यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते ।।

द्वितीय श्लोक

समानो मन्त्र: समिति: समानी समानं मन: सह चित्तमेषाम्
समानं मन्त्रमभि मन्त्रये व: समानेन वो हविषा जुहोमि ।।

तृतीया श्लोक

समानी व आकूति: समाना ह्र्दयानि व: ।
समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति ।।

।। ॐ शांति: शांति: शांति: ।।

संगठन मंत्र का अर्थ (Sangathan Mantra)

पहला श्लोक

पग से पग मिलकर चलो ,स्वर से स्वर मिलकर बोलो ,तुम्हारे मन में समय ज्ञान हो ,पूर्व कल में जैसे देवों ने अपना भाग प्राप्त किया ,एक साथ मिलकर बुद्धि से कार्य करने वाले उसी प्रकार अपना-अपना अभीष्ट प्राप्त करते है।

दूसरा श्लोक

मिलकर कार्य करने वालों का मंत्र सामान होता है चित्त सहित इनका मन सामान होता है। मैं तुम्हे मिलकर समान निष्कर्ष पर पहुंचने की प्रेरणा देता हूँ ,तुम्हे सामान भोज्य प्रदान करता हूँ।

तीसरा श्लोक

हम सभी के संकल्प एक सामान हो ,हम सभी के ह्रदय की इच्छाएं एक सामान हो ,हम सभी के विचार एक सामान हो जिनसे की हम सब में पूर्ण समरसता आए

ॐ शांति हो ,ॐ शांति हो ,ॐ शांति हो ||

संगठन मंत्र का महत्व (Sangathan Mantra Importance)

संगठन का महत्व:
संगठन मंत्र में संगठन के महत्व को बताया गया है। संगठन को शक्ति, वीरता, धर्म, संस्कृति, राष्ट्र-विकास, राष्ट्र-उन्नति, राष्ट्र-रक्षा, धर्म, सत्य, नीति और शक्ति का आधार माना गया है। संगठन को सर्वस्व और जीवन का आधार माना गया है।

संगठन और सुख-शांति:
संगठन मंत्र में कहा गया है कि जिस देश में संगठन नहीं, वहाँ सुख-शांति नहीं। संगठन ही देश को एकता और शक्ति प्रदान करता है। संगठन से ही देश में सुख-शांति आती है।

संगठन और शक्ति:
संगठन मंत्र में कहा गया है कि संगठन ही शक्ति है। संगठन से ही वीरता का जन्म होता है। संगठन से ही राष्ट्र का विकास और उन्नति होती है। संगठन से ही राष्ट्र की रक्षा होती है।

संगठन और धर्म:
संगठन मंत्र में कहा गया है कि संगठन ही धर्म है। संगठन ही संस्कृति को संरक्षित करता है। संगठन से ही राष्ट्र की उन्नति होती है।

संगठन और सर्वस्व:
संगठन मंत्र में कहा गया है कि संगठन ही सर्वस्व है। संगठन ही जीवन है। संगठन ही आधार है। संगठन ही विश्वास है।

संगठन मंत्र के लाभ (Sangathan Mantra Benefit)

राष्ट्र के महत्व को समझना:
संगठन मंत्र संगठन के महत्व को समझने में मदद करता है। संगठन ही शक्ति, वीरता, धर्म, संस्कृति, राष्ट्र-विकास, राष्ट्र-उन्नति, राष्ट्र-रक्षा, धर्म, सत्य, नीति और शक्ति का आधार है।

राष्ट्र के प्रति समर्पण:
संगठन मंत्र संगठन के प्रति समर्पण को बढ़ावा देता है। संगठन ही कार्यकर्ताओं का सर्वस्व है। संगठन ही कार्यकर्ताओं का जीवन है। संगठन ही कार्यकर्ताओं का आधार है।

राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बढ़ावा:
संगठन मंत्र राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बढ़ावा देता है। संगठन ही देश को एकता और शक्ति प्रदान करता है। संगठन से ही देश में सुख-शांति आती है।

धर्म और संस्कृति को संरक्षित:
संगठन मंत्र धर्म और संस्कृति को संरक्षित करने में मदद करता है। संगठन ही धर्म का पालन करने का आधार है। संगठन ही संस्कृति को संरक्षित करता है।

राष्ट्र के विकास और उन्नति में योगदान:
संगठन मंत्र राष्ट्र के विकास और उन्नति में योगदान देता है। संगठन से ही राष्ट्र का विकास और उन्नति होती है। संगठन ही देश को मजबूत और स्वावलंबी बनाता है।

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चंद्र देव मंत्र (Chandra Dev Mantra)



ॐ सों सोमाय नम:।

Chandra Dev Mantra In English

Om Som Somay Namha

Meaning Of Chandra Dev Mantra

ॐ: ब्रह्मांड का मूल मंत्र

सों: चंद्र देव का बीज मंत्र

सोमाय: चंद्र देव को समर्पित

नम: प्रणाम

“ॐ” का अर्थ है ब्रह्मांड का मूल मंत्र। यह मंत्र ब्रह्मांड की शक्ति और ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करता है। “सों” का अर्थ है चंद्र देव का बीज मंत्र। यह बीज मंत्र चंद्र देव की शक्ति और ऊर्जा को भी दर्शाता है। “सोमाय” का अर्थ है चंद्र देव को समर्पित। यह मंत्र चंद्र देव को अपना आराध्य मानता है। “नम:” का अर्थ है प्रणाम। यह मंत्र चंद्र देव के प्रति श्रद्धा और भक्ति व्यक्त करता है।

चंद्र देव मंत्र विधि (Chandra Dev Mantra Vidhi)

सर्वप्रथम चंद्र देव मंत्र का जाप करने के लिए एकांत स्थान पर बैठें।

चंद्र देव मंत्र का जाप करते समय अपने मन को शांत रखे।

चंद्र देव मंत्र का जाप करने के लिए चंद्र देव की प्रतिमा या तस्वीर के सामने बैठें।

चंद्र देव मंत्र का जाप आपने हाथों को जोड़कर शुरू करें।

चंद्र देव मंत्र का जाप करते समय अपने मन में चंद्र देव के प्रति श्रद्धा और भक्ति रखें।

मंत्रों का उच्चारण स्पष्ट होना चाहिए।

चंद्र देव मंत्र के लाभ (Chandra Dev Mantra Benefit)

मन को शांति:
चंद्र देव मंत्रों का जाप करने से मन को शांति मिलती है।

भावनाओं को नियंत्रित:
चंद्र देव मंत्र का जाप करने से भावनाओं को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

एकाग्रता:
चंद्र देव मंत्र का जाप करने से एकाग्रता बढ़ती है।

जीवन शक्ति:
चंद्र देव मंत्र का जाप करने से जीवन शक्ति में वृद्धि होती है।

चंद्र दोष:
चंद्र देव मंत्र का जाप करने से चंद्र दोष दूर होता है।

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राम रक्षा स्तोत्र मंत्र (Ram Raksha Stotra Mantra)



राम रक्षा स्तोत्र मंत्र (Ram Raksha Stotra Mantra)
विनियोग:
अस्य श्रीरामरक्षास्त्रोतमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः ।
श्री सीतारामचंद्रो देवता ।
अनुष्टुप छंदः। सीता शक्तिः ।
श्रीमान हनुमान कीलकम ।
श्री सीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्त्रोतजपे विनियोगः ।

अथ ध्यानम्‌:
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपदमासनस्थं,
पीतं वासो वसानं नवकमल दल स्पर्धिनेत्रम् प्रसन्नम ।
वामांकारूढ़ सीता मुखकमलमिलल्लोचनम्नी,
रदाभम् नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलम् रामचंद्रम ॥

राम रक्षा स्तोत्रम्:
चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥1॥

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितं ॥2॥

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥3॥

रामरक्षां पठेत प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥4॥

कौसल्येयो दृशो पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुति ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥5॥

जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥6॥

करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥7॥

सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
उरु रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृताः ॥8॥

जानुनी सेतुकृत पातु जंघे दशमुखांतकः ।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामअखिलं वपुः ॥9॥

एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृति पठेत ।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥10॥

पातालभूतल व्योम चारिणश्छद्मचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥11॥

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन ।
नरौ न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥12॥

जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥13॥

वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत ।
अव्याहताज्ञाः सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥14॥

आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः ।
तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥15॥

आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान स नः प्रभुः ॥16॥

तरुणौ रूपसम्पन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥17॥

फलमूलाशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥18॥

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।
रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥19॥

आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशा वक्ष याशुगनिषङ्गसङ्गिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम ॥20॥

सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन् मनोरथान नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः ॥21॥

रामो दाशरथी शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥22॥

वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः ।
जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥23॥

इत्येतानि जपन नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्राप्नोति न संशयः ॥24॥

रामं दुर्वादलश्यामं पद्माक्षं पीतवाससम ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नरः ॥25॥

रामं लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं,
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम ।
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शांतमूर्तिं,
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम ॥26॥

रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥27॥

श्रीराम राम रघुनन्दनराम राम,
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम,
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥28॥

श्रीराम चन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि,
श्रीराम चंद्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीराम चन्द्रचरणौ शिरसा नमामि,
श्रीराम चन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥29॥

माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः स्वामी,
रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर्नान्यं,
जाने नैव जाने न जाने ॥30॥

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मज ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ॥31॥

लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथं ।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥32॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीराम दूतं शरणं प्रपद्ये ॥33॥

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम ॥34॥

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥35॥

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्पदाम् ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥36॥

रामो राजमणिः सदा विजयते,
रामं रमेशं भजे रामेणाभिहता,
निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं,
रामस्य दासोस्म्यहं रामे चित्तलयः,
सदा भवतु मे भो राम मामुद्धराः ॥37॥

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥38॥

Ram Raksha Stotra Mantra English Lyrics

asy shriiraamarakshaastrotamantrasy budhakowshik ṛshiah .
shrii siitaaraamachandro devataa .
anushṭup chhandah. siitaa shaktiah .
shriimaan hanumaan kiilakam .
shrii siitaaraamachandrapriityarthe raamarakshaastrotajape viniyogah .
ath dhyaanam‌:

dhyaayedaajaanubaahun dhṛtasharadhanusham baddhapadamaasanastham,
piitam vaaso vasaanam navakamal dal spardhinetram prasannam .
vaamaankaaruudh siitaa mukhakamalamilallochanamnii,
radaabham naanaalankaaradiiptam dadhatamurujaṭaamaṇḍalam raamachandram ॥

raam rakshaa stotram:
charitam raghunaathasy shatakoṭi pravistaram .
ekaikamaksharam punsaan mahaapaatakanaashanam ॥1॥

dhyaatvaa niilotpalashyaamam raamam raajiivalochanam .
jaanakiilakshmaṇopetam jaṭaamukuṭamaṇḍitam ॥2॥

saasituuṇadhanurbaaṇapaaṇin naktancharaantakam .
svaliilayaa jagattraatumaavirbhuutamajam vibhum ॥3॥

raamarakshaan paṭhet praajñah paapaghniin sarvakaamadaam .
shiro me raaghavah paatu bhaalam dasharathaatmajah ॥4॥

kowsalyeyo dṛsho paatu vishvaamitrapriyah shruti .
ghraaṇam paatu makhatraataa mukham sowmitrivatsalah ॥5॥

jihvaan vidyaanidhiah paatu kaṇṭham bharatavanditah .
skandhow divyaayudhah paatu bhujow bhagneshakaarmukah ॥6॥

karow siitaapatiah paatu hṛdayam jaamadagnyajit .
madhyam paatu kharadhvamsii naabhin jaambavadaashrayah ॥7॥

sugriiveshah kaṭii paatu sakthinii hanumatprabhuah .
uru raghuuttamah paatu rakshahkulavinaashakṛtaaah ॥8॥

jaanunii setukṛt paatu janghe dashamukhaantakah .
paadow vibhiishaṇashriidah paatu raamaakhilam vapuah ॥9॥

etaan raamabalopetaan rakshaan yah sukṛti paṭhet .
s chiraayuah sukhii putrii vijayii vinayii bhavet ॥10॥

paataalabhuutal vyom chaariṇashchhadmachaariṇah .
n drashṭumapi shaktaaste rakshitam raamanaamabhiah ॥11॥

raameti raamabhadreti raamachandreti vaa smaran .
narow n lipyate paapairbhuktin muktin ch vindati ॥12॥

jagajjaitraikamantreṇ raamanaamnaabhirakshitam .
yah kaṇṭhe dhaarayettasy karasthaaah sarvasiddhayah ॥13॥

vajrapañjaranaamedam yo raamakavacham smaret .
avyaahataajñaaah sarvatr labhate jayamangalam ॥14॥

aadishṭavaan yathaa svapne raamarakshaamimaan harah .
tathaa likhitavaan praatah prabuddho budhakowshikah ॥15॥

aaraamah kalpavṛkshaaṇaan viraamah sakalaapadaam .
abhiraamastrilokaanaan raamah shriimaan s nah prabhuah ॥16॥

taruṇow ruupasampannow sukumaarow mahaabalow .
puṇḍariikavishaalaakshow chiirakṛshṇaajinaambarow ॥17॥

phalamuulaashinow daantow taapasow brahmachaariṇow .
putrow dasharathasyaitow bhraatarow raamalakshmaṇow ॥18॥

sharaṇyow sarvasatvaanaan shreshṭhow sarvadhanushmataam .
rakshahkulanihantaarow traayetaan no raghuuttamow ॥19॥

aattasajjadhanushaavishuspṛshaa vaksh yaashuganishaṅgasaṅginow .
rakshaṇaay mam raamalakshmaṇaavagratah pathi sadaiv gachchhataam ॥20॥

sannaddhah kavachii khaḍgii chaapabaaṇadharo yuvaa .
gachchhan manorathaan nashch raamah paatu salakshmaṇah ॥21॥

raamo daasharathii shuuro lakshmaṇaanucharo balii .
kaakutsthah purushah puurṇah kowsalyeyo raghuuttamah ॥22॥

vedaantavedyo yajñeshah puraaṇapurushottamah .
jaanakiivallabhah shriimaanaprameyaparaakramah ॥23॥

ityetaani japan nityam madbhaktah shraddhayaanvitah .
ashvamedhaadhikam puṇyam sampraapnoti n samshayah ॥24॥

raamam durvaadalashyaamam padmaaksham piitavaasasam .
stuvanti naamabhirdivyairn te samsaariṇo narah ॥25॥

raamam lakshmaṇapuurvajam raghuvaram siitaapatin sundaram,
kaakutstham karuṇaarṇavam guṇanidhin viprapriyam dhaarmikam .
raajendram satyasandham dasharathatanayam shyaamalam shaantamuurtin,
vande lokaabhiraamam raghukulatilakam raaghavam raavaṇaarim ॥26॥

raamaay raamabhadraay raamachandraay vedhase .
raghunaathaay naathaay siitaayaaah pataye namah ॥27॥

shriiraam raam raghunandanaraam raam,
shriiraam raam bharataagraj raam raam .
shriiraam raam raṇakarkash raam raam,
shriiraam raam sharaṇam bhav raam raam ॥28॥

shriiraam chandracharaṇow manasaa smaraami,
shriiraam chandracharaṇow vachasaa gṛṇaami .
shriiraam chandracharaṇow shirasaa namaami,
shriiraam chandracharaṇow sharaṇam prapadye ॥29॥

maataa raamo matpitaa raamachandrah svaamii,
raamo matsakhaa raamachandrah .
sarvasvam me raamachandro dayaalurnaanyam,
jaane naiv jaane n jaane ॥30॥

dakshiṇe lakshmaṇo yasy vaame ch janakaatmaj .
purato maarutiryasy tam vande raghunandanam ॥31॥

lokaabhiraamam raṇarangadhiiram raajiivanetram raghuvamshanaatham .
kaaruṇyaruupam karuṇaakaram tam shriiraamachandram sharaṇam prapadye ॥32॥

manojavam maarutatulyavegam jitendriyam buddhimataan varishṭham .
vaataatmajam vaanarayuuthamukhyam shriiraam duutam sharaṇam prapadye ॥33॥

kuujantam raamaraameti madhuram madhuraaksharam .
aaruhy kavitaashaakhaan vande vaalmiikikokilam ॥34॥

aapadaamapahartaaram daataaram sarvasampadaam .
lokaabhiraamam shriiraamam bhuuyo bhuuyo namaamyaham ॥35॥

bharjanam bhavabiijaanaamarjanam sukhasampadaam .
tarjanam yamaduutaanaan raamaraameti garjanam ॥36॥

raamo raajamaṇiah sadaa vijayate,
raamam ramesham bhaje raameṇaabhihataa,
nishaacharachamuu raamaay tasmai namah .
raamaannaasti paraayaṇam parataram,
raamasy daasosmyaham raame chittalayah,
sadaa bhavatu me bho raam maamuddharaaah ॥37॥

raam raameti raameti rame raame manorame .
sahastranaam tattulyam raamanaam varaanane ॥38॥

Ram Raksha Stotra Mantra Video